शुक्रवार, 27 जून 2008

अपने लिए....

प्रिय मैत्रेयी,
"मेरी" कहने का अधिकार नहीं है अब। कभी नहीं सोचा था कि तुम्हें इस तरह से पत्र लिखूंगा। पर कहते हैं न, मनुष्य के अन्तिम समय में वो अपने अतीत को जीने लगता है। मैं भी इसका अपवाद नहीं हूँ। क्या करूँ? कुछ दिनों से मेरा दिमाग मेरा साथ नहीं दे रहा। दिल तो खैर पहले ही साथ छोड़ चुका था। तुम्हारे बाद जीवन में कुछ बचा था तो बस तुम्हारी यादें। पर वो भी अब चुक गयी हैं। इससे पहले कि आँखे हमेशा के लिए मुंद जाएँ, एक बार आ जाओ। शायद कुछ यादें फिर बन जाएँ? डॉक्टर कहते हैं सिर्फ़ ५-६ महीने। पर मैं जानता हूँ कि तुमसे मिले बिना नहीं जा पाऊंगा। आजकल अपने पुश्तैनी घर में हूँ। अम्मा तो ४ साल पहले गुजर गयीं। अब अकेला ही हूँ। अगर आ सको तो देर ना करना।
तुम्हारा रंजन
जाने सुबह से कितनी ही बार पढ़ लिया पत्र को। परेशान है, हैरान है, नहीं जानती क्या भाव आए गए। सिर्फ़ अतीत झाँक रहा है। जिस अतीत को समय समय पर रौंदती चली आयी है, नहीं सोचा था कि अचानक एकदम सामने आ खड़ा होगा। क्या करे वह? उम्र के इस पड़ाव पर जबकि उसके हमव्यस्क अपने अपने नाती-पोतों में, कीर्तन भजन में व्यस्त हैं, वह अपने पहले प्यार के इस पत्र को पढ़ रही है?? सोचते हुए रौंगटे खड़े हो गए मैत्रेयी के!!
अगर मानसी ने देख लिया तो? वह भी छोड़ के चली जायेगी मानव की तरह? नहीं नहीं ऐसा नहीं होना चाहिए। इस उम्र में अब और अघात नही सह पायेगी वह।
मानसी के आने का समय हो चला था। आजकल दूतावास के चक्कर काट रही थी। वीजा मिलते ही चली जायेगी वह। फिर अकेली हो जायेगी मैत्रेयी। क्या करे? मानसी को बताये सब? समझदार है, समझेगी माँ के दिल को। वह भी तो हमेशा मानसी की सहेली ही बनी है। आज उसे भी मानसी की जरूरत है।
रात को मानसी के सोने के बाद फिर एक बार पत्र पढ़ा। स्वयं ही एक चेहरा सामने आ गया, जिसे हमेशा भूलने की कोशिश करती रहती थी। उसे लगता था कि यह चेहरा उसे उसके कर्तव्य से डिगा सकता है। नहीं जानती थी कि पहला प्यार कभी नही भूल सकता कोई।
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"बिट्टो, जल्दी करो। भाई तैयार खड़ा है। उसे देर हो रही है।"
"आई अम्मा।"
भाई के साथ ही कॉलेज जाना होगा, इसी शर्त पर बाबूजी माने थे उसे कॉलेज भेजने को। बाबूजी का गुस्सा सब जानते थे और उनके आदर्श भी। आदर्श...... लड़कियों को ज्यादा लिखने पढने की जरूरत नहीं है, माँ या घर की किसी औरत को निर्णय नहीं लेने होंगे। उनका काम है घर पर आराम से बैठ कर अन्य जरूरतें पूरी करना। किसी तरह से मनाया था उसने बाबूजी को कॉलेज जाने के लिए। माँ ने भी बहुत मिन्नतें की थी कि जब तक शादी नहीं हो जाती तब तक पढ़ने में कोई हर्ज़ नहीं है। और फिर आजकल लड़के भी पढ़ी लिखी लड़की चाहते हैं। बाबूजी का कहना था कि दहेज़ हर कमी को पूरा कर सकता है। और फिर मैत्रेयी उनकी इकलौती बेटी है। उसके लिए कोई कमी नहीं। पर माँ ने किसी तरह मना ही लिया था उन्हें।
सच ही था कोई कमी नहीं थी उसे बस एक स्वतंत्रता छोड़ कर। स्कूल कॉलेज हमेशा भाइयों के संरक्षण में गयी। घर पर बाबूजी का संरक्षण। कभी कभी उसे सहेलियों के यहाँ जाने की अनुमति मिल जाती पर वहां भी लाने और ले जाने का जिम्मा किसी न किसी भाई का ही होता।
जब से कॉलेज में आयी थी, उसे लगता था कि घर के बाहर भी एक संसार है। विचारों को पर लग गए थे। अपनी छोटी छोटी बातों को काव्यमय बनाना तो उसने बचपन में ही सीखा था। जब अम्मा रसोई का काम करते हुए गुनगुनाती थी तब वह बहुत ध्यान से सुनती थी। अम्मा के पास कर काम के लिए गाना था! चाहे भूख लगी हो, या किसी देवी से रसोई को भरा पूरा रखने की मिन्नत हो, या घर में किसी को बुखार आने पर उसके ठीक होने की कामना हो, पड़ोस में किसी जचगी में गाना हो, कोई भी अवसर हो, अम्मा के पास हमेशा रेडिमेड गाना मिलता था। अम्मा से ही उसने बातों को गीतों में ढालना सीखा था। कॉलेज की पत्रिका में जब पहली बार उसने कविता लिखी तब बहुत प्रशंसा पायी थी उसने। तभी परिचय हुआ था रंजन से। उससे २ साल सीनियर था रंजन। कई पत्रिकाओं में लिखता भी था। पूरा कॉलेज उसे रंजन कवि ही कहता था। ज्यादा बड़े खानदान का नहीं था। पर अपनी योग्यता के बलबूते ही अपनी साख बनाई थी उसने। जब रंजन ने उसकी प्रशंसा की तो सकुचा गयी थी मैत्रेयी। किसी भी अनजान पुरूष से बात करने का यह पहला अवसर था। वह लड़कियों के स्कूल में पढ़ी थी। कॉलेज में किसी लड़के से मित्रता करने का प्रश्न ही नहीं उठता था। बाबूजी का साया हमेशा उसके साथ चलता था। उस दिन भी घर आकर बाबूजी के सामने आने से बचती ही रही। पर रंजन इन सब बातों से अनजान था। बहुत सीधे सीधे बात कहने वाला व्यक्ति था वह। उसके बाद मैत्रेयी ने कई बार अनुभव किया कि रंजन उससे बात करने का बहाना ढूंढ़ता रहता था। हालांकि मैत्रेयी कभी भी उसे नही दर्शाती कि उसे उसकी बातों में कोई भी रूचि है, पर कहीं न कहीं उसे भी उसकी बातें अच्छी लगती थीं। धीरे धीरे उनमें औपचारिक बातचीत होने लगी। कब कैसे और कहाँ यह प्रेम में परिवर्तित हो गयी? मैत्रेयी को सोचने का अवसर ही नहीं मिला। कई देर तक दोनों बैठ कर भविष्य के सपने बुनते। उनका एक घर होता, जिसमें मैत्रेयी और रंजन रहते बिना किसी बंधन के। अक्सर दोनों बच्चों के नाम को लेकर झगड़ा कर बैठते थे। रंजन कहता कि बच्चों का नाम 'म' से रखेंगें। मैत्रेयी का कहना था कि 'र' से! तब तय होता कि एक का नाम 'र' से और दूसरे का 'म' से। समय पंख लगा कर उड़ रहा था। मैत्रेयी को पता ही नहीं चलता था कि कब दिन निकल जाता है? उसने अपनी एक अलग दुनिया बना ली थी। जहाँ सिर्फ़ प्रेम, स्वतंत्रता थी। बाबूजी उस दुनिया में नहीं थे। उनका भान तो तब हुआ जब रंजन ने उसे बताया कि उसे उसी कॉलेज में व्याख्याता का पद मिल गया है और उसने अपनी अम्मा से मैत्रेयी के बारे में बात की है। अगले महीने उसकी अम्मा मैत्रेयी के बाबूजी से बात करने जाएँगीं। मैत्रेयी ने सुना तो डर कर रह गयी। बाबूजी को वह जानती थी। वो कभी नहीं मानेंगें। उनके हिसाब से रंजन कभी भी उसे वह खुशियाँ नहीं दे पायेगा जो उसके खानदान की लड़की को मिलनी चाहिए। उसने रंजन को कहा भी पर रंजन का कहना था कि कभी न कभी तो इन सबका सामना करना ही पड़ेगा न। बात भी सच थी। क्या पता बाबूजी का दिल पिघल जाए? क्या पता वो उतने कठोर न हों जितना मैत्रेयी उन्हें समझती है? ज्यादा से ज्यादा क्या होगा? मना करेंगे न? पर उसको यह अफ़सोस तो नहीं रहेगा न कि उसने कोशिश ही नहीं की।
पर मैत्रेयी क्या जानती थी कि नियति उसके साथ कुछ और ही खेल खेलना चाहती थी। रंजन की अम्मा का अपमान करके भी बाबूजी को संतोष नहीं हुआ। उन्होंने मैत्रेयी का कॉलेज ही छुड़वा दिया। मैत्रेयी ने कितनी विनती की कि उसको पढ़ाई पूरी करने दो। अम्मा भी बेचारी बाबूजी को मनाती रहीं। पर बाबूजी ने तो जैसे दुर्वासा का रूप ही धारण कर लिया था। आनन फानन में उसकी शादी भी तय कर दी सुधाकर के साथ। सुधाकर के पिताजी का बहुत बड़ा व्यवसाय था। बस बाबूजी को इसी बात से संतोष था। उसने कितने हाथ पैर जोड़े बाबूजी के कि अभी शादी नहीं करनी उसे। मात्र २० की ही तो थी वह! पर बाबूजी को कोई उनके निर्णय से नहीं हिला सका। आखरी बार कॉलेज गयी तो रंजन से भी नहीं मिल पायी। सुना कि वह शहर छोड़ के चला गया। कहाँ गया? किसी को नहीं पता।
विवाह करके मैत्रेयी ससुराल आ गयी। ससुर को मिलाकर ४ भाइयों का संयुक्त परिवार था। ४ ससुर, ४ सासें, जेठ-जेठानियाँ, ननदें, देवर सब मिला कर लंबा चौडा कुनबा। सुधाकर ने उसे पहले दिन ही बता दिया था कि उसे अब जिंदगी भर इन लोगों के साथ ही रहना है। अलग होने कि सपने में भी ना सोचे। सुधाकर के ३ बहनें थी। माता पिता और बहनों के बाद मैत्रेयी के बारे में सोचा जाएगा। उनके लिए माता पिता का कहा पत्थर की लकीर था। मैत्रेयी ने आने के बाद पहले ही दिन से अपने आप को परिस्तिथियों के हिसाब से ढाल लिया। जब पहली बार मायके गयी तब अम्मा की गोद में सर रखकर खूब रोई थी। पर जैसे ही बाबूजी कमरे में आए, उठकर चली गयी। उसे अपना गुस्सा दिखने का और कोई रास्ता नज़र नहीं आया। अम्मा कर भी क्या सकती थीं??
उसकी शादी के ३ साल बाद अम्मा चली गयीं। उसकी मायके से प्यार की वह डोर भी टूट गयी। अब बस राखी-भाईदूज पर एक औपचारिक चिट्ठी के साथ भाइयों को टीका भेज देती थी। बड़े भाई ने अपनी मर्जी से विवाह किया और विदेश जाकर बस गए। छोटा भी अपनी पसंद की पत्नी लाया। बाबूजी की किसी ने नहीं सुनी। छोटे भाई के बेटा होने पर जब सालों बाद मायके गयी, तब बाबूजी की हालत पर तरस आया। भाभी उनको गैरजरूरी सदस्य मानती थी घर का। बाबूजी ने आंखों आँखों में उससे क्षमा मांगी और उसने भी प्रत्युतर में बाबूजी को क्षमा कर दिया। वापस आने के १ महीने बाद उनकी मृत्यु की ख़बर आयी।
सास ससुर की सेवा, ननदों की शादी, देवरों की देखभाल और शादियाँ करते करते पता नहीं कैसे समय निकलता चला गया। पहले मानव, फिर मानसी ने उसके सूनेपन को दूर किया। सुधाकर हलाँकि कभी अपने कर्तव्य में कोताही नहीं करते थे, पर उनके लिए वह घर की एक सदस्य से ज्यादा कभी नहीं रही। मैत्रेयी कभी नहीं समझ पाई कि सुधाकर के मन में क्या है? हमेशा उनको खुश करने की कोशिश करती रहती थी पर उनके पास किसी भी भावना के लिए समय नहीं था। न ही उन्होंने मैत्रेयी से कभी कुछ माँगा न ही पूछा। मैत्रेयी ने भी नियति से समझौता कर लिया था। हाँ उसने लिखना नहीं छोड़ा था। जीवन के अनुभवों को हमेशा कुछ शब्द देती रहती थी।
सुधाकर समय समय पर उसको हिदायत देते रहते थे कि उसके केवल १ सास-ससुर या ३ ननदें ही नहीं हैं। सारा परिवार उसका है। मैत्रेयी तो उनकी सुनती थी और उस पर अमल भी करती थी। पर जैसे जैसे परिवार बढ़ रहा था, छोटे मोटे मनमुटाव भी होने लगे थे। धीरे धीरे बढ़ कर स्थिति यहाँ तक आ गयी थी कि अब सास ससुर की मृत्यु के बाद सब भाइयों के परिवार अलग हो गए थे। सुधाकर यह आघात नहीं सह पाये और मैत्रेयी को अकेला छोड़ गए। उनके जाने के बाद मानव ने व्यवसाय संभाल लिया था। मानसी तो छोटी थी। पढ़ रही थी। मैत्रेयी ने निश्चय किया था कि मानसी को खूब पढ़ाएगी। मानसी शुरू से ही उसके करीब रही थी। शायद छोटी होने के बाबजूद औरत के दिल की बात समझती थी। मानव ने अपनी पसंद से शादी की थी। मैत्रेयी ने खुशी खुशी विनीता को अपना लिया था। पर नियति अभी तक मैत्रेयी से बदला ले रही थी। विनीता स्वतंत्रता की पक्षधर थी। स्वतंत्रता से उसका मतलब मनमानी करना था और उसका मानना था कि परिवार का मतलब है वह और मानव। मानव भी विनीता के सामने मजबूर हो जाता था। जब मानव और विनीता घर छोड़ कर गए, तब मैत्रेयी बहुत अकेली हो गयी थी। पर तब मानसी ही थी जिसने उसे संभाला था।
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टन टन ............ सुबह के ६ बज गए थे। मैत्रेयी ने अपने जीवन के ४८ वर्षों का लेखा जोखा एक रात में कुछ शब्दों में कैद किया और डायरी बंद कर दी। किसके लिए?? शायद कोई नहीं है इसीलिए इस डायरी में। रंजन का पत्र भी उसने वहीँ रख दिया। मानसी को जगाना होगा। आज फिर उसे दूतावास जाना है। आज तो वीजा मिल जायेगा। मानसी ने हमेशा उसका सर गर्व से ऊँचा किया है। इंजीनियरिंग के बाद उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका जा रही थी।
मानसी को १५ दिन बाद का टिकट मिल गया। १५ दिन!!! इतनी सारी तैयारी करनी होगी। बैठ के बिटिया के साथ समय गुजारे या उसको विदा करने का समान इकठ्ठा करे? पता ही नहीं चला कि १५ दिन कैसे और कहाँ निकल गए? मानव भी उसको शुभकामनाएं देने आया था। विनीता को कुछ जरूरी काम था। मानव ज्यादा रुका नहीं। मानसी ने भी नहीं कहा उसको रुकने के लिए। रात में माँ बेटी साथ ही सोये। मानसी मैत्रेयी के हाथों पर सर रखकर सोयी जैसे बचपन में सोती थी।
सुबह टैक्सी आ चुकी थी। मानसी ने मैत्रेयी को एयर पोर्ट आने से मना कर दिया था। ठीक भी था। वहां जाकर बस बाहर से विदा देनी थी मानसी को। मानसी ने जाते जाते माँ का आशीर्वाद लिया। मैत्रेयी की आँखें भर आयीं। मानसी ने उसके हाथ में एक कागज़ दिया। मैत्रेयी पहले समझ नहीं पाई, फिर सोचा की शायद बेटी ने उसे डॉक्टर की दवाइयों के साथ हिदायत दी है। बाद में पढ़ लेगी।
मानसी के जाने के बाद घर मैत्रेयी को काटने को दौड़ रहा था। हर तरफ़ बस मानसी की यादें ही फैली पड़ी थीं। कुछ देर घर को समेटना नहीं चाहती थी वह। रंजन का पत्र भी दिमाग में कौंध रहा था। पता नहीं कैसा होगा वह? शाम को बैठी तो याद आया कि मानसी ने जाते जाते उसे कागज़ पकड़ाया था। निकाल कर पढ़ने लगी। जैसे जैसे पढ़ती गयी, उसके पैरों तले धरती सरकने लगी। मानसी का पत्र था। लिखा था,
प्यारी माँ,
केवल कहने के लिए तुम्हें प्यारी नहीं कहा है। माँ तुम मुझे सबसे ज्यादा प्यारी हो। अपने बचपन से ही मैंने तुम्हें कभी परेशान नहीं देखा। हमेशा पापा के गुस्से, उनकी अवहेलना को तुम्हारे मुस्कुराते चहरे के पीछे छुपी तुम्हारी आंखों में देखा। तुम मुझे बच्ची समझती हो पर माँ मैं भी आखिर एक औरत हूँ। हमेशा सोचती थी कि पापा क्यों तुमसे ढंग से बात नहीं करते?? क्यों नहीं तुम दोनों कभी कहीं घुमने जाते हो?? क्यों नहीं तुम्हारे और पापा के बीच हँसी- ठिठोला या गिला शिकवा होता? धीरे धीरे समझ आने लगा कि पापा ऐसे ही थे। वो शायद हमसे भी ज्यादा बात ही नहीं करते थे। मैं और मानव भी उनसे जब जरूरी होता था और जितना जरूरी होता था तब और उतना ही बात करते थे। पर हमारे पास तो तुम थीं, हमारे दोस्त थे। तुम्हारे पास कौन था माँ? क्या तुम्हें कभी किसी दोस्त की कमी नहीं खली?मैं हमेशा सोचती थी कि जब मैं बड़ी हो जाऊंगी तब तुम्हारी दोस्त बनूंगी। पर मैं भूल गयी थी कि मैं चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो जाऊं, तुम्हारे लिए तो हमेशा नन्ही बच्ची ही रहूंगी न!मैं जानती हूँ माँ, पापा का जाना तुम्हें उतना नही तोड़ पाया जितना मानव का जाना। पापा तो दूसरी दुनिया में गए थे और फिर उनका होना या ना होना शायद हम तीनों के लिए कोई मायने नहीं रखता था। माँ मुझे माफ़ करना अपने स्वर्गवासी पिता के लिए ऐसे नहीं बोलना चाहिए पर क्या करूँ माँ? मैंने हमेशा तुम्हें पापा की परछाई बने देखा है और पापा!! उनके लिए तो तुम्हारा कोई अस्तित्व ही नही रहा। मैं जानती हूँ कि मानव के घर छोड़ के जाने से तुम बहुत टूट गयी थी। मानव को तुमने पाला पोसा था। बहुत आशाएं लगाईं होंगी उससे। पर उसको भी तुमने हंसकर ही विदा किया था। तुम्हें देख कर कभी कभी गुस्सा आता था। क्या तुम्हें अपने लिए कुछ नहीं चाहिए?? क्या तुम्हें हक जाताना नहीं आता?? फिर सोचती थी कि मैं इस लायक बनूँगी कि तुम्हें मानव और पापा की कमी महसूस नहीं होने दूँगी। माँ तुमने मुझे बहुत प्रेरणा दी है। कठिन से कठिन इम्तेहान में हमेशा मुझे उत्साहित किया है। मैं हमेशा स्तब्ध होती थी कि इतना कम पढ़ने लिखने वाली मेरी माँ कैसे मुझे पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित करती है?? यह तुम्हारा आशीर्वाद और तुम्हारी तपस्या ही है जो आज मैं किसी लायक बनने जा रही हूँ । कल जब तुम बाज़ार गयीं थीं, तब मेरी नज़र तुम्हारी डायरी पर गयी। यूँ ही उत्सुकतावश उसे पढ़ना शुरू किया। हालांकि मैं जानती हूँ कि यह सही नही है। तुम्हारी डायरी बिना तुम्हारी आज्ञा के नहीं पढ़नी चाहिए। पर सच बताऊँ माँ, 1-2 कवितायें पढ़ने के बाद मुझे अच्छा लगने लगा था। मैं सोच भी नहीं सकती थी कि मैं एक कम पढ़ी लिखी औरत के शब्द पढ़ रही हूँ। उस डायरी में तुम्हारा बचपन पढ़ा। सच में तुमने बहुत सहा है माँ। शायद तुमने कभी बचपन जिया ही नहीं। सीधे बुढापे को महसूस किया है। तुम्हारा जीवन पढ़ते पढ़ते मैं भगवान् को धन्यवाद दे रही थी कि मुझे इस संसार की सबसे अच्छी माँ दी है। फिर एक पत्र मिला इस डायरी से। तुम समझ गयी होगी कि किस पत्र कि बात कर रही हूँ मैं? माँ मैं तुमसे कुछ नहीं पूछूंगी। जब तुमने नहीं बताया तो जरूर ही नहीं बताना चाहोगी। बस इतना कहूँगी कि अब अपने लिए भी कुछ निर्णय लो माँ। तुमने सबकी मर्ज़ी को अपनी किस्मत बना लिया हमेशा। अब अपने बारे में सोचो। पापा नहीं रहे, मानव को भी अब तुम्हारी जरूरत नहीं है। मुझे तो हमेशा तुम्हारा सहारा चाहिए पर अब मैं भी तुम्हारा संबल बनना चाहती हूँ। माँ तुम अपने लिए खुशियाँ समेटो। मैं तुम्हारे साथ हूँ। आज हम सबसे ज्यादा शायद किसी और को तुम्हारी जरूरत है। किसी की अन्तिम इच्छा पूरी करो माँ। मेरे लिए तुम्हारी खुशी से बढ़कर कुछ नहीं है। तुम्हारे हर निर्णय में तुम्हारी बेटी तुम्हारे साथ है। अब तुम अकेली नहीं हो। किसी को कुछ स्पष्टीकरण देने की आवश्यकता नहीं है। मैं हूँ तुम्हारे साथ और हमेशा रहूंगी। तुम्हारे मुंह से "हाँ" सुनने के लिए तुम्हें पहुंचते ही फ़ोन करुँगी। तुम्हारी बेटी
मानसी
पत्र पूरा करते करते मैत्रेयी की आंखों से आंसूं रुक नहीं रहे थे। उसकी नन्ही सी बिटिया इतनी समझदार हो गयी? आज उसे लगा की जीवन की तपस्या सफल हुई है। उसे बेटी के रूप में नया दोस्त मिला है। एक नयी स्फूर्ति के साथ वह उठी। कागज़ कलम लेकर रंजन को लिखने कि वह आ रही है। उसके पास, हमेशा के लिए। कुछ अधूरे सपनों को पूरा करने। अपने सारे कर्तव्यों को निभाने के बाद। आज उसने पहली बार अपने लिए कुछ चुना है। पहली बार अपने लिए कोई निर्णय लिया है।

16 टिप्‍पणियां:

zakir hussain ने कहा…

aapne bahut achhi kahani likhi hai.
badhai !!!!!!!!!
kam shabdon main vishaal bhawnayain piro di hain

Amit K. Sagar ने कहा…

बेहद अच्छी. लिखते रहिये. शुभकामनयें.
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उल्टा तीर

Suresh Gupta ने कहा…

बहुत सुंदर. आँखें गीली कर दी आपने.

छत्तीसगढिया .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…

बढिया प्रयास है आपका, धन्यवाद । इस नये हिन्दी ब्लाग का स्वागत है ।
शुरूआती दिनों में वर्ड वेरीफिकेशन हटा लें इससे टिप्पणियों की संख्या प्रभावित होती है
पढें हिन्दी ब्लाग प्रवेशिका

Raji Chandrasekhar ने कहा…

स्वागत हैं आप का ।
मैं केरल का एक ब्लोगर, मलयलम मैं और थोड़ा थोड़ा हिन्दी में भी ब्लोग्ता हूँ ।

महेन ने कहा…

आपका लेखन अच्छा है। कहानी पसंद आयी। शुभकामनाएँ।
शुभम।

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

बहुत खूब। कहानी पढ कर अच्छा लगा। बधाई स्वीकारें।

श्रद्धा जैन ने कहा…

khanai padh kar khoob achha laga
badhayi aapko pragya itni sunder kahani likhne ke liye

shahroz ने कहा…

शब्दों की सिर्फ बाजीगरी नहीं है, जैसा आजकल के कथित लेखक कर रहे हैं .स्थितियां साफ- साफ बयाँ हैं यहाँ .कलम रुके नहीं , बस्स लिखती जाएँ .और भी बहुत कुछ है लेखिका के खजाने में उसे प्रज्ञा से बचाओ मुबारकबाद !

Richa ने कहा…

accha prayas hai..

अनूप शुक्ल ने कहा…

बहुत् सुन्दर्!

pallavi trivedi ने कहा…

bahut sundar bhaavon se otprot kahani...behad pasand aayi.

अनुराग ने कहा…

बहुत अच्छे ...कहानी को जिस तरह से बाँधा है ....आपने ..एक बार पढ़ना शुरू किया तो पढता ही गया..लिखती रहे....इंतज़ार रहेगा......

P. C. Rampuria ने कहा…

घणी सुथरी कहाणी लिखी सै आपनै !
बहुत आनन्द आया ! शुभकामनाए !

ललितमोहन त्रिवेदी ने कहा…

कहानी में रोचकता और प्रवाह दौनों का सामंजस्य है ,अच्छा लिख रहीं हैं ! जारी रखें

विक्रांत शर्मा ने कहा…

बहुत खूब..बहुत ही बढ़िया कहानी लिखी है आपने.