Friday, September 11, 2009
रिप्लाई टू आल
Monday, April 6, 2009
नन्ही परी
कहते हैं बच्चे इश्वर का दूसरा रूप होते हैं. जब तक आम्या (मेरी बेटी) हमारे जीवन में नहीं आई थी, तब तक यह बात सिर्फ कहावत थी हमारे लिए. उसके आने के बाद इस बात की गहराई को महसूस किया. अब तो लगता ही नहीं की कभी ऐसा भी था की हम उसके बिना भी रह रहे थे. उसकी एक एक बात हमारे लिए किसी कोहिनूर हीरे से कम नहीं है.
उसके तीसरे जन्मदिन (११ फरवरी) के अवसर पर यह कविता बनाई थी पर ब्लॉग पर अब डाल रही हूँ.
कल की जैसे बात हो, हमारे आँगन को उसने किया गुलज़ार
हमारी ज़िन्दगी में रस घोला, पूरे घर में आ गयी जैसे बहार
दादा-दादी, नाना-नानी को मिला नया खिलौना
पापा और माँ की बाहें बनी उसका बिछौना
पल पल में रोना ही थी सिर्फ उसकी भाषा
हम सब की मनौती, हम सबकी आशा
वो दिन भर की थकन के बाद रात भर का जागना
बस उसकी एक झलक से उस थकन का भागना
उसका घुटनों पर चलना वो पहला कदम
उसकी छोटी पायल की घर भर में छम-छम
समय के साथ धीरे धीरे उसका भी बढ़ना
अपनी बात मनवाने के लिए हम सबसे लड़ना
उसकी शरारत उसकी मुस्कान
उसके गुड्डे गुडिया, मेरे घर के मेहमान
अब तो क्या घर में है होना, बताने लगी है
अपनी बातों से हमें भी अब चलाने लगी है
अब नन्ही मेरी स्कूल जाने लगी है
जैक एंड जिल की कहानी सुनाने लगी है
उसके हाथ अब रंगों को पकड़ने लगे हैं
मेरे घर की दीवारों पर अब घर बनने लगे हैं
मेरा बचपन वो वापस है लायी
मेरे घर में एक नन्ही परी है आई
Saturday, March 14, 2009
अपनी पहचान
सुबह सुबह फ़ोन की घंटी बजी। (हमारी सुबह ११ बजे के बाद ही होती है।)
हमारी ख़ास सहेली सरिता का फ़ोन था। कुछ परेशान नज़र आई। हम समझ गए कुछ दिनों के लिए कोई मसाला मिल गया है। वैसे भी भाई, सादा जीवन जीने का भी कोई मज़ा है? ना कोई रंग, न उमंग..... कितना बोर जाती है ज़िन्दगी?
खैर, सरिता ने जो हमें बताया उसे सुनकर हमारे पैरों तले ज़मीन ही खिसक गयी भाई। हालांकि हमें किसी मसाले की तलाश थी, पर यह?
हमारी एक और ख़ास सहेली रेनू अपने पति से तलाक लेने जा रही थी। बस फिर क्या था? हमने और सरिता ने तय किया की पूरी बात का पता लगा कर ही रहेंगे।
ठीक एक घंटे बाद हम दोनों रेनू के घर पर थे। हमें देखते ही खुश हो गयी वह। बहुत अच्छे से स्वागत किया हमारा। जाते ही शरबत पिलाया। हम थोड़े हैरान परेशान थे। कनखियों से सरिता को घूरा। कहीं ग़लत ख़बर तो हाथ नहीं लग गयी? एक दूसरे का हालचाल पूछने के बाद इधर उधर को बातें होती रहीं आधे घंटे तक। अब हम कुछ बोर होने लगे थे। (आज के बाद सरिता की बात का विश्वास ही नही करेंगे!!)
तभी अचानक रेनू ने कहा की उसको आज शाम को अपने वकील से मिलने जाना है। हमें और सरिता को जैसे करंट लगा। (सुना है चूहों को करंट पसंद है!)
अब हमारे हाथ बात का जरिया लग गया जिसकी तलाश में थे हम। हमने पूछा की क्यों जाना है वकील के यहाँ?
रेनू- "मैं तलाक लेने जा रही हूँ।"
"क्यों?"
"बस लगता है कि कुछ अपनी पहचान नहीं है। बहुत नीरस हो गयी ज़िन्दगी। सब खाली खाली लगता है।"
(रेनू हमें किसी पहुंचे हुए सन्यासी की तरह नज़र आने लगी )
यह हाल तो हमारा भी था... सोचते हुए अपने सर को झटका दिया......
"खाली खाली मतलब?"
"सब कुछ बेमानी सा"
(जैसे आजकल १०० का पत्ता!!)
लम्बी साँस भरते हुए रेनू बोली।
"तो इसमें तलाक लेने की क्या बात है?" अब बारी सरिता की थी।
"नहीं बस ऐसे ही..."
"ऐसे ही???" हमारा सर घूम गया (ऐसे ही तलाक तो सितारे लेते हैं। इस पर उनका सर्वाधिकार सुरक्षित है )
"मेरा मतलब है कि मैं अपने को जानना चाहती हूँ।"
"हाँ तो?? इसमें तलाक लेने कि क्या जरूरत है?" सरिता ने उपाय बताया " किसी डॉक्टर के पास चली जाओ।" जांच पड़ताल करा लो।" (डॉक्टर से उसका मतलब शायद मनोवैज्ञानिक से था )
रेनू ने थोड़ा घूर के जवाब दिया "नहीं मुझे कोई बीमारी थोड़े ही है? मैं तो भली चंगी हूँ।" बस थोड़ा आज़ादी चाहती हूँ। अपनी पहचान बनाना चाहती हूँ।"
ऐ लो... घूम फिर के बात वहीँ आ गयी... तलाक क्यों??
अब हमने नाक को दूसरी तरह से पकड़ना ठीक समझा।
"क्या राजेश (रेनू के पति) का किसी और से चक्कर चल रहा है?"
"मुझे नहीं लगता.... पर तुम कभी भी इन मर्दों के बारे में नही जान सकती। कम से कम पतियों के बारे में तो बिल्कुल ही नहीं।"
(मतलब एक कारण यह भी हो सकता है )
"क्या तुम्हे कोई और पसंद आ गया है?"
"क्या मतलब है तुम्हारा? क्या मैं तुम्हे विश्वासघाती लगती हूँ??"
(काश मर्द हमारे बारे में ऐसा न सोचते हों जैसा हम उनके बारे में सोचते हैं!)
"सास ननद की कोई परेशानी?"
"उनकी कोई औकात जो मुझे कुछ करने पर मजबूर करें??"
(इस विषय में बात ना ही करें तो अच्छा है)
"तो आख़िर बात क्या है? क्या कारण है तलाक लेने का? आख़िर वकील को भी तो बताना पड़ेगा कोई कारण"
"मैं बस अपनी पहचान बनाना चाहती हूँ। सुबह से शाम तक वही एक नीरस ज़िनदगी। घर, बच्चे, रसोई... ज्यादा से ज्यादा किसी के यहाँ मिलने चले जाओ बस.... यह भी कोई ज़िन्दगी है?"
"तुमने नौकरी भी तो अपनी मर्ज़ी से छोड़ी थी न? राजेश को कोई ऐतराज़ नहीं था तुम्हारे काम करने से।"
"हाँ पर सोचती हूँ कि अगर अलग रहूंगी तो अपनी पहचान बना पाऊंगी। कुछ करके दिखा सकती हूँ। किसी पर निर्भर होकर रहने कि क्या जरूरत है? अपने मन से ज़िन्दगी जियो। जब जो करना चाहो वो करो। "
"वो तो अभी भी करती हो न?"
"हाँ पर बंधा बंधा सा लगता है सब"
अब हम उसका वही रिकॉर्ड चालू नही करना चाहते थे। सो हमने पूछा "ठीक है अलग हो जाओगी तो नौकरी भी तो करोगी?"
"जरूरी नहीं है।"
"तो क्या करोगी? कैसे अपना खर्चा चलाओगी?"
"अरे.... राजेश है न? व देगा खर्चा? मुझे नौकरी करने की क्या जरूरत है?"
(रेनू को हम स्कूल के जमाने से जानते हैं। उसका पढ़ाई में कुछ ख़ास दिल नहीं लगता था। किसी तरह बी.ऐ. पास करके टाइपिस्ट की नौकरी पा ली थी )
"पर तुम तो कह रही थी कि तुम किसी पर निर्भर नहीं रहना चाहती"
"हाँ.... निर्भर से मेरा मतलब आर्थिक नहीं, मानसिक था" रेनू ने किसी दार्शनिक कि तरह हमें ज्ञान पेला।
ओह.... यानी सीधे सादे शब्दों में रेनू अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला छुडाना चाह रही है और अपने अधिकारों को इस्तेमाल करना चाह रही है..... ठीक है नारी मुक्ति का ज़माना है। अपनी पहचान बनने का हर किसी को अधिकार है। अगर उसने अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाई है तो कुछ ग़लत नही किया...
हमने सरिता को (और ख़ुद को भी!!) समझाया।
हमने रेनू को भरपूर साथ देने का वादा किया। वो बहुत खुश हुई कि उसको हम जैसी सहेलियां मिलीं। हमने भी उसका एहसान माना कि उसने हमारे चक्षु खोल दिए। आज से हम भी अपनी पहचान बनाने (कुछ अलग) की कोशिश करेंगे।
धन्यवाद रेनू और उन जैसी सभी नारियों का!! उनको कोटि कोटि प्रणाम!!
Saturday, January 24, 2009
मन्नत
कभी कभी कितनी कश्मकश हो जाती है जीवन में? मन कुछ चाहता है पर आप किसी को बोल नही सकते। कितना औपचारिक बन जाता है सब कुछ?
आज ५ दिन हो गए, अस्पताल में ही हूँ... आशा मौसी के पास। उनको छोड़ के जाने का जी ही नहीं कर रहा। कभी नहीं सोचा था कि उनको इस हालत में देखूंगी। पर वही सब कुछ तो नहीं होता न जो हम चाहते हैं। यही ज़िन्दगी है।
आशा मौसी.... हम लोगों के लिए एक प्रेरणा, एक आदर्श... वो हमारी सगी मौसी नहीं हैं। पर सगी से कम भी भी नही हैं। कभी कभी खून के रिश्तों से ज़्यादा मजबूत दिल और प्यार के रिश्ते होते हैं। आशा मौसी हमारे पड़ोस में रहती थीं। उन दिनों अंकल-आंटी कहने का इतना रिवाज़ नहीं था। चाचा, मामा, मौसी, बुआ... बस यही संबोधन सुनने में आते थे। हमारे पास वाले घर में एक छोटा सा परिवार था। पति-पत्नी और दो बच्चे। जब हमारा स्थानांतरण हुआ, तब पिताजी को यही घर उचित लगा। कारण कि उनको अक्सर शहर के बाहर जाना पड़ता था और मैं होने वाली थी तो माँ-पिताजी ऐसे घर कि तलाश में थे जो अस्पताल से दूर भी न हो और पड़ोस भी अच्छा हो। पहली मुलाकात में ही शास्त्री जी पिताजी को अच्छे लगे। बस वो माँ-पिताजी के चाचा-चाची बन गए और मेरे और भइया के नाना-नानी। इस तरह आशा हमारी मौसी बनीं और श्याम हमारे मामा। हलाँकि श्याम हमारे मामा न होकर भइया ही थे। उनकी और मौसी की उम्र में बहुत अन्तर था।
बचपन के दिन बहुत अच्छे होते हैं। अगर इंसान का बस चले तो इस दुनिया में कोई बड़ा ही न हो। मेरा बचपन तो अपने घर से ज़्यादा आशा मौसी के घर में ही बीता है। मौसी के साथ सोना, खाना-पीना, खेलना। कब सुबह से शाम हो जाती थी, पता ही नही चलता था। यहाँ तक कि मेरा गृहकार्य भी मौसी के ही जिम्मे था। पिताजी भी निश्चिंत होकर बाहर जाते थे। माँ को बहुत सहारा था शास्त्री नाना-नानी के होने से। कौन जानता था कि अचानक ही इस सहारे को सबसे छीन लिया जाएगा। एक बहुत सामान्य दिन था। असामान्य तरीके से गुजर गया। नाना की छाती में अचानक दर्द उठा। श्याम मामा की परीक्षाएं चल रही थीं। वो सुबह जल्दी उठ कर पढ़ाई करते थे। उन्होंने ही नाना को तड़पते हुए देखा। नानी को उठाया। हमारे घर आकर पिताजी को बुलाया। जल्दी जल्दी उन्हें अस्पताल लेकर गए। पर रास्ते में ही नाना की आँखें मुंद गयीं। मैं बहुत छोटी थी पर अचानक कैसे परिवार बिखरता है, इसका एहसास कुछ कुछ हुआ था।
नाना महाविद्यालय में व्याख्याता थे। नानी ज़्यादा पढ़ी लिखी नहीं थी। श्याम मामा अभी विद्यालय में ही थे। जिम्मेदारियों ने जैसे आशा मौसी को अपने आप ही अचानक बहुत बड़ा बना दिया। हालांकि उनका स्नातक अभी पूरा नहीं हुआ था पर नाना की अच्छी छवि की वजह से उनको क्लर्क की नौकरी उसी महाविद्यालय में मिल रही थी। यह मौका मौसी ने हाथ से जाने नहीं दिया। मौसी ने नौकरी के साथ साथ अपनी पढ़ाई भी जारी रखी। धीरे धीरे ज़िन्दगी ढर्रे पर आने लगी थी। समय आगे बढ़ता रहा। आशा मौसी उस घर का बेटा बन गयी थीं। उन्होंने नानी को कभी एहसास नहीं होने दिया कि घर में किसी बात की कमी है। हमेशा घर का माहौल खुशनुमा बनाने कि कोशिश करती रहती। श्याम मामा का बड़ा भाई बन कर रहती। मामा ने भी मौसी का हमेशा मान रखा। पढ़ाई में हर दम आगे। खेल कूद के साथ साथ, घर के बाहर का काम भी करते। कभी इस बात को महसूस नहीं होने दिया कि घर में किसी बड़े पुरूष कि कमी है। मौसी ने भी बहुत लगन से पढ़ाई की। स्नातकोत्तर करने के बाद पी एच डी की और उसी महाविद्यालय में प्राचार्य बन गयी। ऐसा उस शहर के इतिहास में पहली बार हुआ था। हम सब बहुत खुश हुए थे मौसी का फोटो अखबार में देख कर। इसी बीच पिताजी की सेवानिवृति हो गयी। भइया को भी बैंक में नौकरी मिल गयी। मेरी प्यारी सी भाभी आ गयीं और मेरी भी उसी शहर में शादी हो गयी। शादी के बाद घर आना जाना जब भी होता तो आधा समय मैं आशा मौसी के साथ ही बिताती।
बस इन सब बातों में एक बात रह गयी, जो मैं अब बैठ कर सोच रही हूँ कि हो ही जाती.... वो है आशा मौसी की शादी। अपनी जिम्मेदारियों को निभाते निभाते उनकी शादी की उम्र निकल गयी। मैं नहीं जानती कि उनको इस बात का पछतावा है कि नहीं पर मुझे अवश्य बहुत दुःख है... खासकर आज उनको इस हालत में देख कर। यह बात सबसे पहले मेरे दिमाग में तब आई जब मेरी शादी होने वाली थी। माँ और भाभी बहुत व्यस्त रहती थी उन दिनों। नानी ने घर का काफ़ी काम संभाला था। एक दिन माँ मेरी विदाई को लेकर बहुत दुखी हो रही थीं, तब नानी ने कहा था -"सबसे अच्छी बात तो यह है कि तुम्हे कन्यादान करने का अवसर मिला। हर किसी के नसीब में यह मौका नहीं होता" उन्होंने अपनी आँखें छुपाने की पूरी कोशिश की थी पर मैंने उनके दर्द को महसूस कर लिया था। कितना अजीब है न?
शादी के बाद अपने घर परिवार में मग्न हो गयी मैं। फिर २ सालों बाद ही हमारा स्थानांतरण दूसरे शहर हो गया तो घर आना-जाना उतनी जल्दी जल्दी नहीं हो पाता था। पर आशा मौसी और परिवार की हर ख़बर रहती थी। श्याम मामा की शादी में गयी थी मैं। मामी बहुत अच्छी आई थीं। नानी और मौसी का बहुत ख्याल रखती थीं। माँ-पिताजी को भी पूरा मान देती थीं। मुझे भी बहुत अच्छा लगता था। खुशी थी आशा मौसी की तपस्या सफल हो गयी थी। अब घर में भी कोई कमी नहीं थी और मौसी भी शहर के जाने माने लोगों में से थीं।
पर आज तक मैं नहीं समझ पायी कि ऐसा क्यों होता है?? किसी की खुशियों को क्यों नज़र लग जाती है?? खुशियाँ समेटने में जहाँ कभी कभी पूरी ज़िन्दगी लग जाती है, उनको बिखरने में एक पल भी नहीं लगता। श्याम मामा और मामी की दुर्घटना और मृत्यु की ख़बर ने मुझे हिला कर रख दिया था। ६ साल के बेटे चिराग को नानी और मौसी की गोद में छोड़ कर चले गए थे दोनों। नानी इस सदमे को नहीं झेल पायीं और कुछ महीनों बाद ही वो भी मौसी को अकेला छोड़ कर चली गयीं। सच में, उस समय मेरा मेरा बहुत मन हुआ मौसी से मिलने का पर बेटे की परीक्षायों की वजह से नहीं जा पायी। जब उनसे मिली, तब तक काफ़ी सामान्य हो गयी थीं मौसी।
नानी के जाने के बाद मौसी को बहुत परेशानी आई। उनकी उम्र भी उतनी नहीं थी की घर, नौकरी और बच्चे की देखभाल कर सकती। थोड़ा बीमार भी रहने लगी थीं। चिराग को किसी बात की कमी महसूस नहीं होने देती थीं। जो कहता, लाकर देतीं। शायद यही उनसे गलती हो गयी। शायद ज्यादा लाड-प्यार ने चिराग को थोड़ा बिगाड़ दिया था। मैं जब उससे पहली बार मिली थी तब वो १० साल का बच्चा था। पर बचपन का भोलापन उसके चहरे पर कहीं नहीं दिखता था। मौसी के कई बार कहने पर भी मेरे पैर नहीं छुए। मुझे खैर कोई बुरा भी नहीं लगा। ज़माना बदल रहा है। साथ साथ आजकल के लोगों की मान्यताएं भी। उसके बाद जब भी घर गयी, तो मौसी को पहले से अधिक कमज़ोर पाया। थोड़े थोड़े दिनों में ख़बर मिल जाती थी कि आज चिराग के स्कूल से मौसी को बुलावा आया था। प्राचार्य को बहुत मिन्नत करनी पड़ी स्कूल से ना निकालने के लिए। नक़ल करता हुआ पकड़ा गया, किसी का सर फोड़ दिया, किसी लड़की कि शिकायत आई है, किसी के भाई ने धमकी दी है......
कुछ समय पहले ही वापस पुराने शहर में आ गयी हूँ। जब से यहाँ आई हूँ, मौसी से लगातार मिलना हो जाता था। अक्सर बीमार रहने लगी थी। मुझे लगता था कि उनकी बीमारी शरीर से ज्यादा मन की थी। शायद उन्हें चिराग की चिंता खाए जाती थी। एक बार उन्होंने दबी ज़बान में मुझसे चिराग के लिए मेरी छोटी बेटी का हाथ भी माँगा था। मैं बहुत असमंजस में आ गयी थी पर मेरी बेटी की ज़िन्दगी का सवाल था। मैंने बोला था कि उससे पूछ कर बताऊंगी। इसी सोच में थी कि मौसी को क्या कहूँ कि उन्हें बुरा भी नहीं लगे। पर लगता है इश्वर ने मेरी समस्या पर अच्छे से गौर किया। मुझे कुछ कहने का मौका ही नहीं मिला। चिराग ने ही मेरी समस्या सुलझा दी। अपने पहचान की ही किसी लड़की से शादी कर ली या यूँ कहें कि शादी करनी पड़ी। लड़की के घरवालों ने डंडे के ज़ोर पर शादी करा ही दी। मौसी ने थोड़े बुझे मन से ही सही पर लता का अच्छे से स्वागत किया। उन्होंने चिराग की खुशी में ही अपनी खुशी ढूढ ली थी। कहती थी की बस अब रिटायर होने के बाद आराम करुँगी।
ऐसा आराम?? अस्पताल में??चिराग की समस्या यह थी कि उसका किसी काम में जी नहीं लगता था। कोई भी नौकरी ६ महीने से ज्यादा टिकती ही नहीं थी। पर ऐश-आराम की आदत पूरी थी। मौसी की वजह से कोई कमी कभी भी महसूस नहीं हुई। बेटा होने के बाद जिम्मेदारियां भी बढ़ गयी थीं और मौसी के रिटायर होने के बाद उनकी पेंशन में गुज़ारा करना लता को बहुत कठिन काम लगता था।
एक दिन मौसी की चीख सुन कर भइया-भाभी दौडे दौडे उनके घर गए। लता ने बताया की मौसी फिसल गयीं। वो तो उसके बेटे के मुंह से निकल गया कि दादी पापा को पैसे नहीं दे रही थीं इसीलिए पापा ने हाथ मोड़ दिया। लता ने बेटे को वहीँ थप्पड़ लगाना शुरू कर दिया। भइया-भाभी दिल पर पत्थर रख कर वापस आ गए कि कहीं मौसी के लिए और मुसीबत न हो जाए। उसके बाद तो मौसी अक्सर ही गिरने फिसलने लगीं। कभी कभी बडबडाने भी लगती। तब चिराग उनका मुंह बंद करता। "बेटे की पढ़ाई डिस्टर्ब होती है न!" लता सफाई देती। यह सब तो मुझे बहुत बाद में पता चला। मुझसे ज़्यादा नहीं सुना गया। मौसी को कहा मेरे साथ चलने के लिए। उन्होंने हँसी में टाल दिया।
काश उस दिन मैं उन्हें साथ ले ही आती तो शायद आज अस्पताल में नहीं होतीं वह। ५ दिन पहले फ़ोन आया था भइया का कि आशा मौसी को अस्पताल ले जा रहे हैं। २ दिन से घर से बाहर दिखायी नहीं दी थीं तो भाभी उनके हालचाल लेने उनके घर गयी थीं। पता लगा २ दिन से कुछ नहीं खाया था। लता ने डॉक्टर को बुलाने की जहमत नहीं उठायी। यह काम भाभी ने ही किया। डॉक्टर ने फ़ौरन अस्पताल ले जाने कि सलाह दी। मुझसे रहा नहीं गया। मैं भी यहीं हूँ तबसे।
मौसी जब होश में आयीं तब कुछ टूटे-फूटे शब्दों में बताया कि उन्होंने इस महीने की पेंशन लेने से मना कर दिया था। बस उसी का नतीजा था। पहले पिटाई, फिर २ दिन तक खाना बंद। इतना कह कर वापस बेहोश हो गयीं। डॉक्टर का कहना है कि उनकी जीने की इच्छा ही ख़तम हो गयी। साथ ही उनके शरीर में बहुत कमजोरी है। दोबारा उनके होश में आने का इंतज़ार कर रहे हैं सभी। आशा मौसी के पहचान के बहुत सारे लोग आकर जा चुके हैं। मैं लता और चिराग के घडियाली आँसू देख देख कर पक चुकी हूँ। उसके बेटे से मालूम हुआ कि अगर मौसी होश में नही आयीं तो उसके पापा को बहुत मुसीबत का सामना करना पड़ सकता है।
चाय की तलब लगी है। अस्पताल की कैंटीन में बैठ कर मौसी के बारे में ही बातें दिमाग में आ रही हैं। यहाँ एक छोटा सा मन्दिर भी बनाया हुआ है। शायद वहां कुछ सुकून मिले। यही सोच कर वहां जा बैठी हूँ। मेरे पास में एक लड़की भी बैठी है। अपने पापा के ठीक होने की मन्नत मांग रही है।
मेरी आँखे अपने आप बंद हो गयी हैं। हाथ भी जुड़ गए हैं। मन्नत मांग रही हूँ कि आशा मौसी ने बहुत कष्ट सह लिए। अब शान्ति से चली जाएँ। वापस इस नरक में नहीं आयें....क्या मैंने ग़लत मन्नत मांग ली है????
Friday, August 22, 2008
बस ऐसे ही.....
बारिश में भीगे हुए मन को बहलाती हूँ
सावन जो बीत गया, उसकी याद दिलाती हूँ
क्या वो तुम ही थे? जो मेरे साथ थे
यह सवाल कई कई बार ख़ुद से दोहराती हूँ।
*****
फिर क्यूँ कूकी कोयल, गौरैया क्यूँ चहकी?
नहीं हैं यहाँ फूल तो क्यूँ फिर बगिया महकी?
पगली यह सावन है पतझड़ नहीं,
यही बात हर बार ख़ुद को समझाती हूँ
*****
चूड़ीवाला हांक लगाता है, बार बार बुलाता है
रंग-बिरंगी चूडियों की रंगीन कहानी सुनाता है
अब इस घर में उसका काम नही
क्यूँ नहीं उसको बतलाती हूँ??
*****
सूरज आज भी ढल गया और चाँद निकल आया है
तुम मेरे साथ नहीं, यह चाँदनी में मेरा ही साया है
अगले सूरज के साथ तुम आओ
कब से बस यही आस लगाती हूँ
*****
एक हिचकी फिर आ गयी, आँखों के पानी से रोका है
मालूम है मुझे यह मेरा भ्रम है, सिर्फ़ एक धोखा है
पर शायद तुमने मुझे याद किया
इसी आस पर हर अगली साँस ले पाती हूँ।
Monday, August 11, 2008
आओ किटियाएं
अब हम आपको क्या बताएं?? इधर कुछ दिनों से बहुत बोर हो रहे थे। अरे जिसको देखो, वही बिजी। बस हम हैं फुरसतिया, न काम न काज। इधर उधर बस ताकते रहते कि कोई मिले तो उसके साथ जरा बतियाएं। बहुत दिनों से पतिदेव से भी पंगा नहीं हुआ कि कुछ इंटरटेनमेंट ही हो जाता। किसी बहाने से हमें भी उनको और उनकी पिछली सात पुश्तों तक को कोसना.... ना ना अपने अमृत वचन कहने का मौका मिलता और हमारी बोरियत भी दूर होती। पर हाय!!! ऐसा हुआ नहीं....
तभी किसी देवदूत की तरह हमारी एक सहेली शशिकला का फ़ोन आया कि उसने कुछ और सहेलियों के साथ मिलकर किटीपार्टी शुरू की है और हमें भी शामिल करने का फ़ैसला किया है। उसकी पहली खेप कल उसके घर पर है तो कल मिलते हैं.... अरे अँधा क्या चाहे??? हमने उसको लाख लाख दुआएं दी। भला हो उस आत्मा का, जिसने हमारा ख्याल किया वरना आजकल कहाँ कोई किसी के बारे में सोचता है??
खैर उस दिन हम सुबह सुबह ही उठ गए। अजी उठे क्या? रात में खुशी के मारे नींद ही नहीं आई कमबख्त। पूरी रात आने वाले दिन के सपने बुनते रहे। सुबह हमने पतिदेव को बोल दिया कि आज अपने खाने का इंतज़ाम कर लें, हमारी 'मीटिंग' है हमारी सहेलियों के साथ। उनने कुछ कहने की कोशिश तो की थी पर हमने आंखों ही आंखों में उसे दबा दिया। अरे!! यह मर्द जात कब समझेगी कि हम औरतों की भी कोई पर्सनल लाइफ है भाई! अगर हफ्ते में एक दिन (कभी कभी दो या तीन दिन भी) खाना नहीं बनायेंगे तो कौन सा पहाड़ गिर जाएगा??पर नहीं बस हमेशा हम औरतों को परेशान करने के नए नए बहाने ढूंढ़तेरहते हैं। क्या हम बस खाना बनाने (कभी कभी ही सही!!) की मशीन हैं??
उंहू.....छोडो यार कहाँ अटक गए हम भी!! हाँ तो हम कह रहे थे कि सुबह सुबह हम लग गए अपने को सँवारने में!! पिछली बार बाज़ार से एक महंगा सा फेसपैक लेकर आए थे, उसका ही उदघाटन किया सबसे पहले। फिर हमने अपने मेकअप की स्ट्रेटेजी बनाई कि कैसे मेकअप किया जाए कि लगे ही नहीं कि कुछ लगाया भी है। अब आप यह मत समझना कि हम बहुत बन संवर के बाहर निकलते हैं। वह तो कभी कभी ही बस........
खैर सबसे बड़ी विडम्बना होती है मौके के हिसाब से कपडों का चयन। क्या पहनें कि अलग दिखें?? अलग यानी कि... आप समझते हैं न???
पहले हाथ साड़ी पर पड़ा। फिर सोचा कि बहनजी ना लगें कहीं? सूट से होते हुए, स्कर्ट के रास्ते जींस को चुना। आख़िर अपने को खुले विचारों का जो दिखाना था!! अब किसी अनजान को तो नहीं पता न कि आप कैसे हैं?? आपके कपडों से ही आपके व्यक्तित्व का अंदाजा लगाया जा सकता है। ऐसा मैं नहीं कहती, कल एक पत्रिका में पढ़ा था। (उसी पत्रिका में जिसमें से हमने "अपने ससुराल से कैसे छुटकारा पायें" की कटिंग संभाल कर रख ली है)
खैर तैयार होने के बाद हम चल पड़े अपनी सहेली के घर। वहां जाकर हमने देखा कि और भी बहुत सारी महिलायें थीं। हमारी सहेली शशिकला ने हमारा परिचय सबसे कराया। हम बहुत खुश हुए चलो बहुत दिनों के बाद नए लोगों से मिल रहे हैं। सबसे दुआ सलाम हुआ। फिर पानी वानी पीने के बाद शशिकला ने नमकीन और चाय परोसा। नमकीन की सबने तारीफ़ की। और बहुत सारे नमकीन की रेसिपी की अदला-बदली भी हुई। हम बहुत खुश हुए कि कितनी अच्छी होती है किटी-पार्टी। कितनी अच्छी अच्छी बातें सीखने को मिलती हैं। फिर शुरू हुआ घर कि सजावट के तरीकों का दौर। हमने भरपूर दिलचस्पी दिखाने की कोशिश की। हालांकि हम कुछ कुछ बोर होने लगे थे। (जब यही सब बातें करनी थीं, तो मिलने की क्या जरूरत? यह सब तो किसी भी अच्छी पत्रिका में पढ़ लो ) और हम शौकीन हैं ऐसी पत्रिकाओं के जिनमें "पति को लाइन पर लाने के १० नुस्खे", "प्रेमी को फंसाए रखने के १५ तरीके", "सास-ननद का दिमाग कैसे करें दुरुस्त?" टाईप लेख पढने को मिलें जो हमारे व्यक्तित्व को सँवारे।
खैर हम सब्र किए रहे कि कभी न कभी तो बोरियत दूर होगी। अजी लानत है ऐसी महिला-मंडली पर जिसमें पति, पूर्व-प्रेमी, सास-ससुर ननद आदि का जिक्र ना आए। खैर हमने ही बीडा उठाने का निश्चय किया। एक औरत जो कि नई नई ब्याही थी, उसे बकरा बनाने की ठानी। बात कुछ इस तरह शुरू हुई:
हम: हेल्लो, न्यूली वेड? (हलाँकि हम जानते थे, फिर भी..... )
वह: एस, आई ऍम निकिता।
हम: ओह... कोंग्रेट्स निकिता....
निकिता: थेंक्स
अब हमने सोचा कि आगे कि बात हिन्दी में करेंगे.....
हम: तो क्या करते हैं आपके पति निकी?
निकी: (जो हमें अपने करीब महसूस करने लगी थी क्यूंकि हमने उसको जानबूझकर उसके मायके वाले नाम से पुकारा था। हमें पता नहीं था लेकिन रिस्क खेला था जो कारगर सिद्ध हुआ!) वो रेलवे में हैं।
हम: अरे वह तब तो आप खूब घूमती होगी !! हनी-मून कहाँ मनाया??
निकी: नहीं अभी तक तो ज्यादा कहीं नहीं जा पाये हैं।
हम: (आश्चर्य का ड्रामा करते हुए) क्यों????????????????
निकी: जी वो सासू माँ की तबियत ख़राब थी।
अब तो बाजी हमारे हाथ में आ गयी। हम समझ गए कि निकी की दुखी रग पर हाथ रख दिया है हमने। उस दिन किस्मत हमारे साथ थी। क्यूंकि इसके बाद कमान शशिकला की एक पक्की सहेली बिन्दु ने संभाल ली। उसने निकी को समझाया कि सास की बिमारी तो बस बहाना होगी। असल में यह प्लान सास या ननद का ही बनाया हुआ होगा। निकी ने बहुत समझाने की कोशिश की। उसकी सास ऐसी नहीं है। पर हम सब औरतों ने उसे आख़िर मना ही लिया की सासें सब ऐसी ही होती हैं। उनको ज्यादा ढील नहीं देनी चाहिए। पति की लगाम जाते ही अपने हाथ में कर लेनी चाहिए।
आख़िर अंत में हम सब औरतों की जीत हुई। (सत्य कभी नही हारता)
उस दिन कसम से, हमने कई दिनों से दबाया हुए गुस्सा (पति, ससुराल का) अपनी हमदर्दनियों के बीच निकाला। ऐसा ही हाल सभी का था। सभी बेचारी बेबस-लाचार औरतें ही थीं। सबने बताया कि कितनी मुश्किल होते हुए भी वोह हफ्ते में २ दिन खाना बनाती हैं? कितनी मुश्किल से लड़-झगड़ के महीने में सिर्फ़ २० दिन ही ब्यूटी-पार्लर जा पाती हैं? उनको खर्च का हवाला दिया जाता है जबकि ननद को हर राखी भाईदूज पर गिफ्ट !!!
सच्ची में ऐसी आनंद कि अनुभूति हुई जैसे कि कई दिनों के बदहाजमे के बाद खूब सारी उलटी करने पर होती है। हमारा तो दिन ही सफल हो गया। दोपहर से शाम तक पता ही नहीं चला समय कहाँ चला गया?? फिर जब घर जाने का वक्त आया, तो सबने निश्चय किया कि अगली किटी-पार्टी हमारे घर होगी। हम तो धन्य ही हो गए जब देवी समान सहेलियों ने मुझ जैसी नाचीज़ को इस काबिल समझा।
अब अगले महीने किटी-पार्टी हमारे घर है। जो महिलायें घर में बोर हो रहीं हों यानी कई दिनों से पति के साथ पट रही है, सास-ननद से कहा-सुनी नहीं हुई हो मतलब आपके जीवन में कोई एक्साइटमेंट नहीं रहा तो उनको हमारी तरफ़ से खुला न्योता है, हमारे घर आयें और किटियाएं।
Wednesday, August 6, 2008
हमारा सिविक सेंस
ऐसा क्यों होता है? सोचने पर मजबूर हो गयी। क्यों हम अपने basic civic sense भूल जाते हैं?
मुझे याद है कि दिल्ली से ग्वालियर और ग्वालियर से दिल्ली आने जाने पर (नौकरी के दौरान) मेरी और सोनल (मेरी सहेली) कि हमेशा किसी न किसी से बहस होती थी। कारन होता था मूंगफली के छिलके जो लोग खाने के बाद कम्पार्टमेंट में फेंकना अपना अधिकार समझते हैं।
एक बार तो हद ही हो गयी जब इस बहस के दौरान हमें पता चला कि सामने वाला व्यक्ति डॉक्टर है। (बाद में यह भी पता चला कि उक्त सज्जन ने डाक्टरी की पढाई रशिया से की है)। हम सोचने पर मजबूर हो गए कि तथाकथित बुद्धिजीवी कहे जाने वाले वर्ग का यह हाल है तो अनपढों को क्या बोलें?
अक्सर बस में लड़ाई होती थी कि जब धुम्रपान मना है तो कोई सिगरेट क्यूँ पी रहा है? सामने से जवाब आता था "मैडम ऑटो या टैक्सी में चला करो" या फिर कभी कभी कोई साथ दे दे और अगर वो भद्र पुरूष है तो उसे जवाब मिलता था "तेरे बाप की बस है?"
यानी कि सड़क, बस, ट्रेन मेरे बाप की नहीं है। तो मुझे क्या? खूब गन्दा करेंगे।
ऐसा एक किस्सा और याद आया बस का। सुबह सुबह दिल्ली कि बसों में खड़ा होने कि जगह मिल जाए तो बहुत है। ऐसे ही एक सुबह जब मैं office जा रही थी, तब एक स्टाप पर एक लड़की चढी। यही कोई १८-१९ साल की थी। चढ़ते साथ ही बस के बाएँ तरफ़ आ गयी जहाँ महिलाओं की सीट होती है। एक बहुत ही वृद्ध सरदारजी से जो किउस महिला सीट पर बैठे हुए थे, कहने लगी अंकल जी लेडीज सीट है, उठिए। अंकल जी चूँकि बहुत वृद्ध थे और काफ़ी देर खड़े होने के बाद उनको यह सीट मिली थी उन्होंने खड़ा होने से साफ़ इनकार कर दिया। बस मैडम को गुस्सा आ गया और अपने लेडी होने का नाजायज फायदा उठाते हुए कंडक्टर से शिकायत करने लगीं। मुझसे रहा नही गया। क्या करूँ? आदत से मजबूर हूँ। पर सुनने को खूब मिला। खैर मुझे खुशी हुई कि ना तो कंडक्टर ने, ना ही उन बूढे सरदारजी ने उसकी बातों पर गौर किया। पर मैं सोचने पर मजबूर हो गयी कि उस बाला में इतनी तमीज भी नहीं (मेरे आक्रामक शब्दों के लिए मुझे माफ़ करें) कि अपने दादाजी कि उम्र के व्यक्ति से कैसे बात karni चाहिए?
मुझे याद है जब हम "१९४२ अ लव स्टोरी" देखने गए थे, तब समाप्त होने पर उस फ़िल्म में जन-गन-मन था। स्कूल और माँ-डैडी की शिक्षा के कारन मैं, मेरी बहन खड़े हो गए थे और वो भी सावधान की मुद्रा में। पर हमें नही पता था की हम लोगों के आने जाने के बीच में रोड़ा बन रहे हैं। जो लोग ३ घंटे की फ़िल्म देख रहे थे, उनसे अब ३ मिनट का सब्र भी नही हो रहा था।
और अब तो हालात और पेचीदा हो गए हैं। अब अगर हम किसी को सड़क की सफाई, ट्रेन की सफाई आदि के महत्व को समझाने की कोशिश करें (और अगर समझने वाला हमारा अपना है) तो हमें सुनना पड़ता है कि विदेश क्या गयी, पूरी अँगरेज़ बन गयी। यानी कि बहुत कठिन है डगर पनघट की
घटनाएं अलग अलग हैं और शायद आपको किसी का तारतम्य समझ नही आएगा। चूँकि मैं बहुत अच्छी मंझी हुई लेखिका नहीं हूँ तो अपनी बात को interesting तरीके से कहना नही आता। पर बातों का सार आपकी समझ आ गया होगा (आप लोग तो बहुत अच्छे पाठक हैं न!!)
हमारे civic sense का क्या होता जा रहा है? किसी को अपनी बारी आने तक का सब्र नहीं है। कोई शुरुआत नही करना चाहता। मेरा मकसद मेरे भारत को नीचा दिखने का कतई नहीं है पर हाँ हम इतने पढ़े लिखे और सुलझे हुए तो हैं ही कि अपनी गलतियों को समझ सकें और ख़ास कर उन गलतियों को जिनका निदान हमारे पास है। सफाई करना और साफ़ रहना, दूसरों के समय का मूल्य समझना, पंक्ति बनाना, बेवजह कार का हार्न न बजाना यह सब कोई भ्रष्टाचार जैसी समस्या नहीं है जिसका निवारण हम अकेले नही कर सकते। कम से कम शुरुआत तो कर ही सकते हैं न!!!
तो बस एक प्रार्थना है, सिर्फ़ टिपण्णी देकर अपना फ़र्ज़ पूरा मत करिए। आज कार से बाहर कोई चीज़ फेंकते हुए, सड़क पर थूकते हुए, किसी से बस में लड़ते हुए या सिगरेट पीते हुए सिर्फ़ एक बार मुझे याद कर लीजियेगा... शायद आप अपने समाज को गन्दा करने से बच जाएँ!!
इसी आशा के साथ...........
प्रज्ञा
मेरे कथन को अन्यथा ना लें। जो मैं महसूस करती हूँ वही लिखा है। और ब्लॉग का पहला नियम भी यही है। है न??