सोमवार, 16 जून 2008

चलो यह करते हैं!!!

मेरी पिछली पोस्ट पर आप लोगों की दुआओं के लिए धन्यवाद। अब हालांकि बाढ़ का पानी कम हुआ है पर अभी भी बाढ़ की स्तिथि बनी हुई है।
आशा है यह जल्दी ही सुधर जायेगी।
मैंने दिल्ली में अमित (मेरे पति) के साथ बहुत अच्छा समय बिताया है। यह वो समय था जब हम अपने अपने करियर को लेकर एक दूसरे का हौसला बढाते थे और साथ ही डेटिंग भी करते थे!! उसके बाद शादी के बाद कुछ समय भी हम रहे वहाँ। उसी समय को याद करते हुए ही यह कविता लिखी है। आपके विचारों का स्वागत है।
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कल तक जो थीं रोज़ की आम बातें,
अब वो कुछ ख़ास यादें बन गयीं है।
इन यादों में हम एक डुबकी लगाएं।
बिताये थे पल कल संग एक-दूसरे के,
फिर से चलो उन बातों को दोहराएं।
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'कोक-पेप्सी' से प्यास बुझती नहीं है,
'मिनरल वाटर' में सौंधी महक नहीं है।
गला सूख रहा है, पानी की है चाहत,
शायद कोई पुरानी अठन्नी पड़ी हो,
ठंडे पानी के ठेले से चलो प्यास बुझाएँ।
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'बोर' है सुनहरी रेतों का 'हाई-फाई बीच',
'लेजर-पार्कों' से भी अब मन भर गया है।
जनवरी की है देखो गुनगुनी मीठी धूप,
फुरसत भी आज कई दिनों बाद मिली है,
चलो 'इंडिया गेट' चल कर पिकनिक मनाएं।
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नहीं निगलते बनते अब 'बर्गर' और 'पिज्जा' ,
'फाइव स्टार' में भी फीका सा ही है खाना।
चलो देखें गली के उस मोड़ पर अब भी,
शायद कोई एक-आध ठेला खड़ा हो,
"चटपटी और पेशल" चाट खाकर आएं।
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'ब्रांडेड' जींस-कमीजें फीकी हैं, चुभती हैं सारी,
'डॉलर्स' के नीचे दबे कुछ 'रुपये' मिले हैं।
फुटपाथ पर काश वो बूढा बैठा हो अब भी,
तुम मुझे चटक गहरे रंग का दुपट्टा दिला दो,
फिर से उस बेचारे बूढे की "बौहनी" कराएं।
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छोड़ दो महंगी विदेशी गाड़ी को घर में,
मत बांधो ख़ुद को 'सीट बेल्ट' में आज,
ना 'ट्रैफिक' का 'टेंशन' ना 'पैट्रोल' की चिंता,
तुम अपने हाथों में बस मेरा हाथ रखना,
मुद्रिका से दिल्ली का एक चक्कर लगाएं।

7 टिप्‍पणियां:

Ram Tyagi ने कहा…

bahut hi aachi kavita likhi hai pragya jee aapane ..

woh puraane din ese lagate hai jaise ..garami se tapate hue tan ko mil jaaye taruwar ki chaayaa ...

keep on writting .. professional writters se acchi likhati ho .. esaa lagataa hai kuch original hai ..touch karane wali baate hai ...

शहरोज़ shahroz ने कहा…

कथ्य बहुत अच्छा है , तुकबंदी से परहेज़ किया जाता टू और बेहतर कविता हो सकती thi .
aakhri से pahle wala band marm ko hole से chutaa है और कविता puri tarah khul kar samne aati है

Surabhi ने कहा…

WOW Diii .... aapke blog ne to bachpan k din yaad dila diye .
bahut sahi .... mera to yeh sab karne ka man karne laga thele ki chaat , thanda pani ... bahut sahi
Mujhe to poem likhna aata nahi ... par aapne jo b likha hai bahut aacha likha hai jo har ek k man main kahin na kahin hota hai ...
I M PROUD OF YOU :)

pallavi trivedi ने कहा…

शायद कोई पुरानी अठन्नी पड़ी हो,
ठंडे पानी के ठेले से चलो प्यास बुझाएँ।
kya baat hai...theth desi kavita. aanand aa gaya...

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

प्रज्ञा आज आपका ब्लॉग पहली बार पढ़ रही हूँ और जब यह कविता पढ़ी तो न जाने क्यूँ आंखे नम हो उठी ..

मत बांधो ख़ुद को 'सीट बेल्ट' में आज,
ना 'ट्रैफिक' का 'टेंशन' ना 'पैट्रोल' की चिंता,
तुम अपने हाथों में बस मेरा हाथ रखना,
मुद्रिका से दिल्ली का एक चक्कर लगाएं।

जिंदगी की भाग दौड़ में हम छोटी छोटी खुशियाँ न जाने भूल आते हैं ..

shivani ने कहा…

जहाँ ले गई है ये कविता ..वहाँ से लौटने का मन नही है, इन छोटे छोटे पलों को काश हम फिर से जी पाते...तुमहारी पहले भी लेखनी पढी है..बहुत सुदंर लिखा है...इस कला को खोने मत देना...

rattan srivastava ने कहा…

jab maine mage the khilone tab ve mujhko nahi mile .ab main inse kya kheloon(Nirala)
Atit chahe kitna bhi kashtprad ho uski yaaden badi madhur hoti hain.I liked yr poem.
yrs lovingly
Phupha(Rattan srivastava)