बुधवार, 30 जुलाई 2008

बिना किसी शीर्षक के

बहुत बुरा समय आया है देश पर। असली बातें भूल कर लोग हिंदू-मुसलमान के चक्कर में पड़ गए हैं। दिल को बहुत दर्द होता है जब भी कोई आतंकी अपनी साजिश में कामयाब हो जाता है। सरकार को बहाना मिला विपक्ष पर चोट करने का और जनता को एक और "topic" मिला बहस का। हम जैसे लोगों को नयी कविता कहानियो का मुद्दा। उन लोगों का दर्द का अंदाजा भी नही लगा सकते जिनके अपने इन धमाकों में खो गए। कब ख़तम होगा यह सब???

आज फिर दिल पर चोट हुई है
आज फिर एक घर जला है
उस ने नहीं देखा किसी का धर्म
कहर तो बस अपने रास्ते चला है

सवेरे की रौशनी अलसाई है
दिन भी यहाँ आज थोड़ा मंद है
कल शाम यहाँ लाशें गिरी थीं
कल धमाकों में सूरज ढला है

मन्दिर की घंटियाँ बंद पड़ी हैं
अज़ान में भी आज आवाज़ नहीं है
मूक हो गए हैं मोहल्ले वाले
आज चुप रहना ही भला है

रहमान चाचा की बेगुनाह आँखे,
माफ़ी मांगती हैं उस राम से
जो बचपन से लेकर जवानी तक
इन बुजुर्ग हाथों में ही पला है...

14 टिप्‍पणियां:

Smart Indian ने कहा…

क्या बात कही है आपने. कविता ने भावुक कर दिया.

रहमान चाचा की बेगुनाह आँखे,
माफ़ी मांगती हैं उस राम से
जो बचपन से लेकर जवानी तक
इन बुजुर्ग हाथों में ही पला है...


न मालूम कब तक मौलाना अजहर मसूद और दाऊद इब्राहीम जैसों के पापों का ठीकरा मासूम राम का खून बहायेगा और बेगुनाह रहमान को नज़रों से गिराएगा.

ज़ाकिर हुसैन ने कहा…

रहमान चाचा की बेगुनाह आँखे,
माफ़ी मांगती हैं उस राम से
जो बचपन से लेकर जवानी तक
इन बुजुर्ग हाथों में ही पला है...

bahut marmik baat likhi hai tumne
sach baat hai ki kathit muslim aatankwadiyon ki kali kartooton ka khamyaja RAM jaise begunahon ko bhugtna padta hai aur uska side effect rehmaan jaison ko bhugtna hota hakhair ummed rakhiye ki jald insaniyat fir apne aap ko manwayegi

अनुराग ने कहा…

रहमान चाचा की बेगुनाह आँखे,
माफ़ी मांगती हैं उस राम से
जो बचपन से लेकर जवानी तक
इन बुजुर्ग हाथों में ही पला है...

puri kavita ka saar yahi panktiya hai...sach me kitna kuch kah gayi.

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

रहमान चाचा की बेगुनाह आँखे,
माफ़ी मांगती हैं उस राम से
जो बचपन से लेकर जवानी तक
इन बुजुर्ग हाथों में ही पला है...

बहुत सही लिखा है आपने ..आज सब दुआ मांग रहे हैं कि मिलते बम फटे न ..शायद यही सबकी दुआ का असर है .

P. C. Rampuria ने कहा…

मन्दिर की घंटियाँ बंद पड़ी हैं
अज़ान में भी आज आवाज़ नहीं है
मूक हो गए हैं मोहल्ले वाले
आज चुप रहना ही भला है

बहुत नाजुक मसले पर जोरदार
अभिव्यक्ति ! शुभकामनाएं !

महेंद्र मिश्रा ने कहा…

आज फिर दिल पर चोट हुई है
आज फिर एक घर जला है
उस ने नहीं देखा किसी का धर्म
कहर तो बस अपने रास्ते चला है.
जोरदार अभिव्यक्ति.

शहरोज़ ने कहा…

समय की तपिश और एहसास की थपक ही नहीं है
बहुत कुछ है इस कविता में.
मुबारकबाद इसलिए भी कि यहाँ काव्य-तत्त्व्य झलकता है.

rakhshanda ने कहा…

रहमान चाचा की बेगुनाह आँखे,
माफ़ी मांगती हैं उस राम से
जो बचपन से लेकर जवानी तक
इन बुजुर्ग हाथों में ही पला है

very nice, first time aapke blog ko visit kiya...achha laga

महामंत्री-तस्लीम ने कहा…

रहमान चाचा की बेगुनाह आँखे,
माफ़ी मांगती हैं उस राम से
जो बचपन से लेकर जवानी तक
इन बुजुर्ग हाथों में ही पला है.

समाज की तार तार होती इंसानियत का सटीक चित्रण किया है।

मोहन वशिष्‍ठ ने कहा…

वाह जी वाह बहुत अच्‍छे ढंग से आपने सच्‍चाई बयां की है बहुत बधाई लिखो और खूब लिखो

ilesh ने कहा…

nice one...

डा. अमर कुमार ने कहा…

.

I repent that I missed your writing all these days.

Gimme a little time before I put any comment over the individual articles. KEEP IT UP.

pallavi trivedi ने कहा…

h...kitni bhaavpoorn aur sundar kavita likhi hai. ek ek shabd sachchai se bhara hua hai.

sachin ने कहा…

pragya, ye wakai bahut achcha he, dil ko choo jane wala.....meri taraf se bahut-2 shubhkamnaye...tum aise hi likho aur hume chamatkrit karti raho...ye mera pehla comment he tumhare rashtrwadi kavita ke liye....badhai

sachin